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Saturday, May 16, 2015

2007- A beautiful poem by Anikesh Wats!

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आहिस्ता चल ज़िन्दगी, अभी कई क़र्ज़ चुकाना बाक़ी है,
कुछ दर्द मिटाना बाकी है, कुछ फ़र्ज़ निभाना बाक़ी है;
रफ्तार में तेरे चलने से कुछ रूठ गए, कुछ छूट गए ;
रूठों को मनाना बाकी है, रोतों को हँसाना बाकी है ;
कुछ हसरतें अभी अधूरी हैं, कुछ काम भी और ज़रूरी हैं ;
ख्वाहिशें जो घुट गयीं इस दिल में, उनको दफनाना बाक़ी है ;
कुछ रिश्ते बनके टूट गए, कुछ जुड़ते जुड़ते छूट गए;
उन टूटे-छूटे रिश्तों के ज़ख्मों को मिटाना बाक़ी है ;
तू आगे चल मैं आता हु, क्या छोड़ तुझे जी पाऊंगा ?
इन साँसों पर हक है जिनका, उनको समझाना बाकी है ;
आहिस्ता चल जिंदगी, अभी कई क़र्ज़ चुकाना बाकी है ।
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